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Thursday, July 23, 2026
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गगवाड़स्यूं घाटी का मौरी मेला 12 वर्षों बाद लगेगा

पौड़ी। जिला मुख्यालय पौड़ी से सटे गगवाड़स्यूं घाटी का मौरी मेला कुंभ व नंदादेवी राजजात की तरह 12 वर्षों में मनाया जाता है। जहां विकासखंड पौड़ी के तमलाग और कोट के कुंडी गांववासी पांडवों को देवताओं के रूप में पूजते हैं। तमलाग गांव में मौरी मेले का आगाज हो गया है। यह मेला छह महीने तक चलेगा, जिसमें बड़ी संख्या में प्रवासी ग्रामीण शामिल होंगे। मेले में पांडव नृत्य और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होना है। छह माह तक चलने वाले इस मेले में बड़ी संख्या में प्रवासी ग्रामीण भी जुटते हैं।
मेले में छह महीने तक पांडव नृत्य के साथ ही विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। मेले के दौरान तमलाग गांव के मध्य स्थित भैरव मंदिर के चौक में प्रतिदिन ढोल सागर से पांडव को अवतरित किया जाएगा। मेले में गणेश पूजन के साथ ही देवप्रयाग तक पैदल यात्रा भी की जाएगी। गेंडी वध, दो पेड़ गांव लाए जाने सहित अन्य पारंपरिक विधियों का भी विधि-विधान से आयोजन किया जाएगा। इस मेले में ढोल दमाऊं की थाप पर माता कुंती और द्रौपदी समेत पांचों पांडव ग्रामीणों पर पश्वा के रूप में अवतरित होते हैं।
किवदंतियों के अनुसार, वनवास काल के दौरान पांडव तमलाग और पौड़ी देवप्रयाग के सबदरखाल के समीप कुंडी गांव में कुछ दिन रुके थे। तब ग्रामीणों ने अपने बेटों की तरह उनका आदर सत्कार किया। माता कुंती ने तमलाग गांव को ससुराल व कुंडी को मायके की उपाधि दी थी। तब से प्रत्येक 12 वर्षों में इन दोनों गांवों में पांडवों की स्मृति में मौरी मेला आयोजित होता है। मेला आयोजक समिति से जुड़े लोगों ने बताया कि मेला दिसंबर से अगले साल जुलाई तक चलेगा। सात माह तक गांवों में पांडव लीला चलती रहेंगी।
ग्रामीणों का कहना है कि नंदा देवी राजजात की तरह ही 12 वर्ष में आयोजित होने वाला यह मेला लोगों में विशेष उत्साह भर देता है। ग्रामीणों ने बताया कि वे 12 साल पहले भी इस मेले में शामिल हुए थे और अब एक बार फिर इसके आयोजन से पूरे क्षेत्र में उल्लास का माहौल है। इस मेले की खास बात यह है कि दूर-दराज में रहने वाले प्रवासी भी अपने गांव लौटकर पूरा सहयोग देते हैं। वहीं जिन ध्याणियों (बेटियों) का विवाह गांव से बाहर हो गया है, उन्हें भी विशेष न्योता भेजा जाता है, ताकि वे अपनी अगली पीढ़ी को इस मेले की धार्मिक महत्ता और पारंपरिक आस्था से परिचित करा सकें।
ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ों में लगातार हो रहे पलायन के बीच यह मेला लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रहा है। 12 साल बाद आयोजित हो रहे इस आयोजन में दूर-दूर से लोग अपने बच्चों के साथ गांव पहुंच रहे हैं, जिससे युवा पीढ़ी का लगाव अपने गांव और परंपराओं से बना रहे। लोककथाओं के अनुसार रूपैणा पांडवों की धर्म बहन थी, जिसका विवाह नारायण नामक राजा से हुआ था।
एक कुंड में स्नान करते समय नारायण कुसमा कुवेण नामक सुंदरी के रूप पर मोहित हो जाते हैं और अपना राजपाठ, रानी रूपैणा व पुत्रों को भूल जाते हैं। तब उपद्रवी दानव उनके राज्य पर आक्रमण कर राज्य को छिन्न-भिन्न और रूपैणा के पुत्रों को मार डालते हैं। यह व्यथा रूपैणा माता कुंती को बताती है, जिस पर कुंती उन्हें उनका राज्य वापस लौटाने का वचन देती हैं। पांडवों ने धर्म बहन को उसका राज्य वापस लौटाकर वचन पूरा किया और यही मौरी अर्थात दान से समृद्धि की संकल्पना इस मेले की आत्मा बन गई।

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