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Thursday, October 22, 2026
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नेपाल फ्लड के बाद उत्तराखंड में 426 ग्लेशियर झीलों की मॉनिटरिंग बड़ी टेंशन

देहरादून। नेपाल में बीते दिन 26 अगस्त 2026 को आई भीषण त्रासदी ने एक बार फिर से उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में मौजूद सैकड़ों ग्लेशियर झीलों की निगरानी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई है, जिसकी मुख्य वजह यही है कि प्रदेश में मौजूद सैकड़ो ग्लेशियर झीलों में से करीब 426 ग्लेशियर झील ऐसी हैं, जिनका आकार 1000 वर्ग मीटर से अधिक है। टेंशन ये है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से लगातार ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिसके चलते ग्लेशियर झीलों का आकार भी बढ़ता जा रहा है।
यही वजह है कि वैज्ञानिक पहले ही इस बात पर जोर दे चुके हैं कि उच्च हिमालय क्षेत्र में मौजूद खासकर अतिसंवेदनशील और संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी की जाए। उत्तराखंड के उसके लिए बजट भी मिल चुका है, फिर भी ग्लेशियर झीलों का मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं लग पाया है। इतने सेंसिटिव मामले में किस तरह की चुनौतियां आ रही है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों की क्या है स्थिति, किन चुनौतियों का करना पड़ रहा है सामना?
उत्तराखंड में ग्लेशियर लेक आउटबस्ट की घटना साल 2013 में केदार घाटी में देखने को मिली थी। इसके बाद से ही ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों की निगरानी पर न सिर्फ राज्य सरकार बल्कि केंद्र सरकार ने विशेष जोर दिया है। ताकि उच्च हिमालय क्षेत्रों पर मौजूद ग्लेशियर झीलों के आकार बढ़ाने की वजह से होने वालों खतरों को समय रहते भांपा जा सके। वहीं उत्तराखंड में जब-जब बड़ी आपदाएं आई हैं, तभी ग्लेशियर झीलों की निगरानी पर सवाल उठते रहे हैं। इसके पीछे की मुख्य वजह यही है कि उत्तराखंड में सैकड़ो की संख्या में ग्लेशियर झील मौजूद है, जिसमें से 426 ग्लेशियर झील ऐसी हैं, जिनका आकार एक हजार वर्ग मीटर से अधिक है। हालांकि सभी ग्लेशियर झीलों की निगरानी करना संभव नहीं है, लेकिन अतिसंवेदनशील और संवेदनशील श्रेणी में रखे गए ग्लेशियर झीलों की समस्याओं पर निगरानी करने की जरूरत है। देश के उच्च हिमालय क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों की संवेदनशीलता को देखते हुए साल 2024 में एनडीएमए ने ग्लेशियर झीलों का अध्ययन कर एक रिपोर्ट जारी की थी। उस रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में मौजूद 1200 ग्लेशियर झीलों में से 13 को अति संवेदनशील और संवेदनशील श्रेणी में रखा था।
एनडीएमए ने झीलों को संवेदनशीलता के आधार पर तीन कैटेगरी में रखा है। अति संवेदनशील 5 ग्लेशियर झीलों को ए कैटेगरी में, कम संवेदनशील वाली चार झीलों को बी कैटेगरी में और सबसे कम संवेदनशील 4 झीलों को सी कैटेगरी में रखा है।
इस रिपोर्ट को जारी करने के साथ ही एनडीएमए में समय-समय पर इसकी निगरानी के निर्देश भी दिए थे, जिसके चलते उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग ने अति संवेदनशील श्रेणी में रखे गए पांच ग्लेशियर झीलों के निगरानी का निर्णय लिया था। इसके लिए उत्तराखंड शासन ने प्रदेश में मौजूद अतिसंवेदनशील और संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए वाडिया इंस्टिट्यूट को नोडल विभाग बनाया था। ताकि इन सभी ग्लेशियर झीलों का बेहतर ढंग से अध्ययन कराए जाने के साथ ही कंटीन्यूअस मॉनिटरिंग के लिए इक्विपमेंट लगाए जा सके। एनडीएमए की रिपोर्ट पर आपदा प्रबंधन विभाग ने अति संवेदनशील व संवेदनशील श्रेणी में रखी गई चार ग्लेशियर झीलों का साल 2024 से 2026 के बीच बाथीमेट्री और ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन कराया। बाथीमेट्री और ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन में हिमालयी क्षेत्रों में झीलों की गहराई, जल क्षमता और पिघलते ग्लेशियरों से जुड़े संभावित खतरों का वैज्ञानिक आकलन किया जाता है।

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