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Saturday, April 25, 2026
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धामी राज में एक के बाद एक टूटे कई सियासी मिथक

देहरादून। जब से पुष्कर सिंह धामी उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बने हैं तब से प्रदेश में एक के बाद एक कई सियासी मिथक टूटे हैं। किसी पार्टी की लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी से लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के पद पर किसी व्यक्ति का रिपीट होना, ये सब पहली बार हुआ है। धामी सरकार की तमाम उपलब्धियों को देखते हुए भाजपा हाईकमान ने सोच समझकर महेन्द्र भट्ट को दोबारा संगठन की कमान सौंपी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को फ्री हैंड दिया गया है। यह तय हो चुका है कि मिशन-2027 की फतह का दारोमदार धामी-भट्ट की जोड़ी पर ही रहेगा।
महेंद्र भट्ट को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर बहाल करने से न केवल पार्टी में उनका कद बढ़ा है, बल्कि इससे प्रदेश में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की स्थिति भी अजेय हो गई है। संदेश साफ है कि भाजपा ने धामी के चेहरे पर 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने का मन बना लिया है। यूं तो प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए भाजपा के कई नेता दावेदारी कर रहे थे, हाईकमान को भी फैसला लेने में मुश्किलें हो रही थीं लेकिन महेन्द्र भट्ट को मुख्यमंत्री धामी का खुला समर्थन हासिल था, जिससे पलड़ा उनके पक्ष में झुक गया। पार्टी सूत्रों का कहना है कि दून से लेकर दिल्ली तक पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता प्रदेश अध्यक्ष पद के लॉबिंग करने में जुटे थे, लेकिन धामी के समर्थन को देखते हुए पार्टी हाईकमान ने भट्ट के नाम पर अपनी मुहर लगा दी। दरअसल, मुख्यमंत्री धामी और भट्ट कैमिस्ट्री अभूतपूर्व है, यही वजह रही कि पिछले कुछ सालों में सरकार और संगठन के बीच जबरदस्त तालमेल देखने को मिला। कभी कोई ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई कि पार्टी को असहज होना पड़ा हो।
वास्तविकता यह भी है कि उत्तराखण्ड ने पिछले 24 वर्षों में 10 मुख्यमंत्री देखे हैं। राजनैतिक अस्थिरता प्रदेश की पहचान रही है। एनडी तिवारी को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। भाजपा के तो किसी भी मुख्यमंत्री को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है। चूंकि भाजपा को प्रदेश की जनता लगातार दो बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सौंप चुकी हैं लिहाजा अब भाजपा पर नैतिक दबाव भी है कि पुष्कर सिंह धामी अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करें ताकि जनता के बीच सरकार की स्थिरता को लेकर एक अच्छा संदेश जाए। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि भाजपा युवा नेता पुष्कर सिंह धामी को अपना ‘लक्की चार्म’ मानती है। धामी ही हैं जिन्होंने भाजपा को लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटाकर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। वह अपना विधानसभा का चुनाव हारकर भी बाजीगर बने थे। अब समान नागरिक संहिता के क्रियान्वयन, दंगा-रोधी कानून बनाने, लव, लैंड और थूक जिहाद के खिलाफ कार्रवाई के उनके फैसलों ने उन्हें काफी लोकप्रिय बना दिया है और पार्टी देश के विभिन्न हिस्सों में हिंदू मतदाताओं को लुभाने के लिए उनकी छवि का इस्तेमाल करने लगी है।
इधर, महेन्द्र भट्ट अपनी सादगी और मृदु व्यवहार की बदौलत गढ़वाल क्षेत्र से प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरा बनकर उभरे हैं। बेबाक बयानों से उन्होंने ‘हाईकोर हिन्दुत्व’ की राह अपनाई है। धामी कुमाऊं से है और राजपूत हैं। दोनों का कॉम्बिनेशन जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों में फिट बैठता है। यही तमाम वजहें रहीं कि महेन्द्र भट्ट को लगातार दूसरी बार प्रदेश संगठन का मुखिया बनाया गया है। संदेश साफ है धामी-भट्ट की जोड़ी पर भाजपा हाईकमान को पूरा भरोसा है। अब निगेटिव नैरेटिव सेट करने वालों के लिए कोई स्पेश बाकी नहीं रह गया है।

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