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Friday, April 24, 2026
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पिरान कलियर जाने पर माफ़ी मंगवाने वालों को बाबा रामदेव ने दिया जवाब, मैं जन्म से ही पाखंड विरोधी हूं

हरिद्वार: जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद और शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप ने स्वामी रामदेव के पिरान कलियर जाने को लेकर सनातन विरोधी करार देते हुए माफी मांगने की मांग की। जिस पर जवाब में बाबा रामदेव ने कहा कि मैं जन्म से ही पाखंड विरोधी हूं |

धर्म संसद में संतों के विवादित बयानों का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ कि पिरान कलियर दरगाह जाने को लेकर धर्म संसद वाले संत योग गुरु स्वामी रामदेव के पीछे पड़ गए हैं। स्वामी रामदेव पिछले दिनों दिल्ली से लौटते वक्त पिरान कलियर पहुंचे थे। इसे जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद ने हिंदू धर्म की आस्था के साथ खिलवाड़ बताया। उन्होंने कहा कि वह स्वामी रामदेव को आर्य समाजी मानते थे। अब उनकी नजर में रामदेव की छवि धूमिल हुई है। उन्होंने सनातन धर्म के साथ गद्दारी की है।

शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि मैं समझ नहीं पाता हूं कि रामदेव हैं क्या। वह स्वामी दयानंद जी के फॉलोअर हैं। पिरान कलियर जाने पर रामदेव को संत समाज से माफी मांगनी चाहिए। हालांकि, हरिद्वार के अखाड़ों के संतों ने खुलकर अभी तक स्वामी रामदेव के पिरान कलियर जाने पर कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन चर्चा जरूर है।

अन्य संतों के निशाने पर आने से पहले ही रामदेव ने ट्वीट कर अपनी सफाई दी। उनका कहना है कि वो जन्म से ही पाखंड विरोधी हैं। कुछ हिंदू विरोधी उनके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। इस मामले में स्वामी रामदेव से संपर्क किया गया तो उन्होंने ट्वीट को ही अपना बयान बताया।

ट्वीट में उन्होंने कहा है कि ‘मैं जन्म से ही पाखंड और अंधविश्वास का घोर विरोधी हूं। वेद धर्म और ऋषि धर्म के अनुरूप आचरण करना ही अपना संन्यास धर्म और सनातन धर्म मानता हूं। मुझसे प्रेम करने वाले कर्नाटक के दो सज्जन पिरान कलियर गए थे। कुछ लोग ईर्ष्या और षड्यंत्र पूर्वक मुझे बदनाम करने के लिए झूठे आरोप लगा रहे हैं। हिंदू विरोधी लोग दुष्प्रचार और षड्यंत्र करें तो यह समझ में आता है, लेकिन अपने ही लोग अपनों से बैर विरोध करें तो बहुत आश्चर्य होता है। ईश्वर हम ऋषियों की संतानों को संगठित रहने और प्रीतिपूर्वक जीने का आशीर्वाद दें।’ बता दें कि 17 दिसंबर से 19 दिसंबर तक हरिद्वार में आयोजित धर्म संसद में महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद और शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप ही वक्ता थे।

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